डॉ. जी मधुसूदन रेड्डी
डॉ. जी मधुसूदन रेड्डी
उत्कृष्ट वैज्ञानिक एवं निदेशक, रक्षा धातुकर्म अनुसंधान प्रयोगशाला (DMRL)

डॉ. जी. मधुसूदन रेड्डी ने 1985 में काकतीय विश्वविद्यालय से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में विशेष योग्यता के साथ अपनी स्नातक की डिग्री प्राप्त की थी। उन्होंने 1987 में आईआईटी रूड़की से ऑनर्स के साथ अपनी मास्टर्स डिग्री पूर्ण की । उन्होंने 1987 में सीवीआरडीई, चेन्नई के साथ वैज्ञानिक के रूप में अपना कैरियर शुरू किया। 1989 में उन्हें डीएमआरएल, हैदराबाद स्थानांतरित किया गया। डीएमआरएल में, उन्होंने आईआईटी मद्रास से अपनी डॉक्टोरल डिग्री के लिए एल्युमीनियम-लिथियम एलोय की वैल्डिंग में केन्द्रित अनुसंधान प्रारंभ किया। उन्हें वर्ष 1999 में दीक्षांत समारोह के दौरान सर्वश्रेष्ठ थीसिस के लिए सुदर्शन भट् पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

लगभग 32 वर्षों तक फैला डॉ. रेड्डी का कैरियर मैटेरियल जोइनिंग और सरफेसिंग के क्षेत्र मे महत्वपूर्ण शोध और विकास योगदानों से परिपूर्ण हैं तथा इसका रक्षा और एरोस्पेस प्रौद्योगिकियों में सीधा अनुप्रयोग हुआ है। वह बहुत बड़े पुर्जों की फ्रिक्शन-स्टिर वैल्डिंग के क्षेत्र में अपनी उत्कृष्टता के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सुप्रसिद्ध है। उन्होंने पेरेंट आर्मर से तुलना योग्य, वैल्डस में ब्लास्टिक क्षमताओं की स्थापना द्वारा बहुत महत्वपूर्ण योगदान दिया है। डॉ. रेड्डी ने इलेक्ट्रॉन बीम दोलन का प्रभाव निकाला है और सुपर एलोय की बैल्डिंग के दौरान लेवेस फेज कम करने में लेसर वेल्डिंग तकनीक का उपयोग किया है, और इस तरह एरो-इंजन पुरजों के मैकेनिकल गुणों में सुधार किया है। उन्होंने एरोस्पेस कार्यक्रमों के लिए शराउड रिंग्स के एरो-फोइल कास्टिंग की ब्राजिंग और ठोस अवस्था में सुपर एलोय ब्लिस्क कास्ट के निम्न एलोय स्टील शाफ्ट की वैल्डिंग के लिए तकनीक विकसित की है। डॉ. रेड्डी ने एरोस्पेस पुरजों में ज्वाइंट्स की संरचनात्मक एकनिष्ठता में महत्वपूर्ण योगदान दिया है और डीएमआरएल में, देश की अग्रणी ठोस-अवस्था वैल्डिंग प्रयोगशालाओं में से एक स्थापित की है, वह इस प्रयोगशाला का नेतृत्व भी कर रहे हैं। वेल्ड-जोन माइक्रोस्ट्रक्चर के रिफाइनमेंट और पल्सड एवं आर्क दोलन तकनीक के क्षेत्र में डॉ. रेड्डी के अग्रणी अनुसंधान से एरोस्पेस में उपयोग होने वाले कठिन टॉवल्ड एल्युमीनियम और टिटानियम एलोय के लिए ज्वाइनिंग तकनीक विकसित करने में मदद मिली है। उनके कुछ अन्य अहम योगदानों में सशस्त्र वाहनों से संबंधित वेल्डमेंट्स का असफलता विश्लेषण, अल्ट्राहाई मजबूत स्टील से बने मोटर केसिंग और ब्रिज लेयर्ड टैंकों की समय-पूर्व असफलता सम्मिलित हैं।

डॉ. रेड्डी को अपने असाधारण योगदानों के लिए मेटालर्जिस्ट ऑफ दि ईयर अवार्ड (2007), साइंटिस्ट ऑफ दि ईयर (2013), राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस अवार्ड (2017), तेलंगाना सरकार द्वारा भारत रत्न श्री मोक्षगुंडम विश्वेश्वरया अवार्ड (2018), जीडी बिरला गोल्ड मैडल 2019), बिनानी गोल्ड मैडल (2010 और 1994) , सैल गोल्ड मैडल (2013), टेक्नोलॉजी लीडरशिप अवार्ड (2018), कैथ हर्टले मेमोरियल अवार्ड ( 2015), एस.के. मजूमदार मेमोरियल अवार्ड (2012), इंजीनियर ऑफ दि ईयर अवार्ड (2002) तथा आंध्र प्रदेश साइंटिस्ट अवार्ड (2006) सहित अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। उन्होंने विभिन्न वैज्ञानिक सोसाइटियों से अपने वैज्ञानिक योगदानों के लिए 35 सर्वश्रेष्ठ शोध पत्र पुरस्कार जीते हैं। वह अमेरिकन सोसाइटी ऑफ मेट्लस, इंडियन नेशनल एकेडमी ऑफ इंजीनियरिंग और तेलंगाना एकेडमी ऑफ साइंसेज, इंस्टिट्यूट ऑफ मेट्लस, इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ वैल्डिंग और इंडियन वैल्डिंग सोसाइटी के निर्वाचित फैलो हैं।

वह बहुत सारे पेटेंट्स का श्रेय लेने के अलावा समीतक्षित जर्नलों में 260 शोध पत्र प्रकाशित कर चुके हैं और इतने ही सम्मेलनों में भाग ले चुके हैं। उन्हें विभिन्न छात्रों का उनकी डॉक्टोरल डिग्रियों के लिए मार्गदर्शन करने की विशेष योग्यता प्राप्त है।

डॉ. रेड्डी ने विभिन्न कार्यशालाएं आयोजित की हैं। वह इंटरनेशनल एडवांस्ड रिसर्च सेंटर फॉर पाउडर मेटालर्जी एंड न्यू मैटेरियल्स, हैदराबाद की शासी परिषद के सदस्य है। तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के प्रमुख विश्वविद्यालयों के अध्ययन बोर्डों के सदस्य के रूप में उनकी विशेषज्ञता का उपयोग हुआ है।

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