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ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

रावलपिण्डी में 1939 में सृजित वैज्ञानिक भण्डार निरीक्षरणालय से एच आर डी ई की श्रंख्ला चली जिसे 1946 की शुरूआत में टीडीई (उपकरण का इल्कट्रॉनिक्स) में दोबारा व्यवस्थित किया गया था और यह देहरादून में पुनः स्थापित किया गया स्वास्थ्यवर्द्धक बैंगलोर के सपास पनप रहे इल्कट्रॉनिक औद्योगिक परिसर टीडीई (आईएवंई) थे, इल्कट्रॉनिक पुर्जे को 1955 के इस प्रारंभिक नगर में स्थापित करने के लिये अलग-अलग घर दिया गया। डीआरडीओ की उन्नति के सगंठन सुक्षा सेवाओ की आकांक्षाएं पूरी करने के लिये 1 जनवरी 1958 को तत्कालीन TDE(E) इल्कट्रॉनिक्स उपकरण निरीक्षरणालय तथा एलआरडीई में विभाजित कर दिया गाया था। एलआरडीई विस्तार एवं विकास में योगदान करने हेतु 1986 में वर्तमान शान्त स्थान पर आ गया।

जनवरी 1958 में बैरेको के उत्कृष्ट स्थान पर उत्पन्न हुए, इलैक्ट्रॉनिक अनुसंधान एवं विकास संस्थापना थे। जून 1962 में इल्कट्रोनिक्स रेजर विकास संस्थान के रूप में वर्तममान नाम दिया गया। मूल्य टीडीई(ई) से प्राप्त कार्मिक, उपकरण एवं सामग्री के साथ उपकरणों में त्रुटियों की जांच सुरक्षा इल्कट्रोनिक्स थे, समूचे स्पेकट्रम वाले उपकरण के कार्य प्रदर्शन में सुधार के लिये अपेक्षित आवश्यक सुधार जैसे कार्यों को प्रारम्भ करने के लिये प्रारम्भ में जोर लगाया था।

प्रारम्भिक वर्षों के दौरान संस्थापना के उद्धेश्यों को पुनः परिभाषित करने की आवश्यकता पुनः अनुस्थापन के लिए समझी गयी थी और आधुनिक परिष्कृत एवं जटिल रेडियो, लाइन संचार / संप्रेषक रडार विद्युतीय, विद्युतीय चिकित्सा उपकरण, पद्धतियां अधिकतम स्वदेशी कलपुर्जे सहित उनके उपकरण के लिए आवश्यक समझी गई थी। प्रत्येक गुजरते वर्षों के साथ निष्ठावान सुयोग्य कार्मिक की भर्ती और अनेक प्रभागों और विभागों के विकास लिये भरसक प्रयत्न किये गए थे ताकि प्रणाली का सार्थक विकास प्रारम्भ करने के लिए कार्य निर्वहन समन्वित पद्धति से हो सके कि रणक्षेत्र में अनाप-श्नाप कार्य का डटकर मुकाबला किया जाए। अपने प्रारम्भिक काल में एलआरडीई इल्कट्रोनिक उपकरण के विधिवत विकास के लिए वैज्ञानिक एवं तर्क संगत दिशानिर्देश को पाया। डीआरडीओ प्रयोक्ता एजेंसियों, निरीक्षण प्राधिकरण एवं अनुरक्षण प्राधिकरण की डीडीपीआईएल-64 के माध्यम से सजावट की गई। एलआरडीई ने परिष्कृत डीडीपीआईएल-69 के सामने लाने में प्रमुख भूमिका निभाई, जो परीक्षण के समय से लेकर आजतक खरी उतरी हालांकि इसमें व्यवहारिक सुधार या परिवर्तन किए गए। साठ के अन्त में रचनागत एवं भागीदार पुनःअनुस्थापित विकास प्रक्रिया जन्मी  थी। प्रकार्यात्मक आधारित रडार प्रभाग, इंजिनियरी सेवा प्रभाग 1967-68 के दौरान व्यवसायिक परियोजना प्रबधन पद्धतियों के अनुरूप अस्तित्व में आई।

रडार के क्षेत्र में सकारात्मक गतिविधियां प्रारम्भ की गई थी। अग्नि नियंत्रण रडार एए संख्या एमके 7 में सुधार, सीएसएफ रडार ईआर 370 पर आधारित एस-1000 एमके 1 रडार का विकास तथा तोपखाने के लिए बारुद एवं बंदूकों का होड़ लगाने के लिए एफएएक्स एमके 1 रडार एवं चलते-फिरते आदमियों और गाड़ियों का पता लगानें के लिये रणक्षेत्र निगरानी रडार, इस अवधि के दौरान रडार क्षेत्र की प्रमुख नवीन उपलब्धियां रही थी। साठ में आधुनिक रडार सम्बन्धी खुला साहित्य के न होने के कारण कार्यरत रडारों के मोड्यूल/संघटकों के विकास के माध्यम से सीखने के अवसर सीमित थे। विश्वास निर्माण एवं अभ्यास की एक दिन जीत हुई और सिस्टम उपलब्धता के लिए ठोस नींव सत्तर एवं अस्सी में रखी गई।

साठ के अन्त और सत्तर के प्रारम्भ सिस्टम विवेक (थिकिंग) के रचनात्मक वर्ष थे, सिस्टम, गुणवत्ता निर्धारण तथा अवसंरचना मापन से सम्बद्ध, संघटक विकास, सहयोगात्मक विकास, उधोग के साथ मिलकर कार्य करने से आत्मनिर्भरता का लक्ष्य प्राप्त हो सकता है। डिजिटल इल्कट्रोनिक्स और सुसज्जित सॉफ्टवेयर प्रत्येक उपकरण का अटूट अंग बन गया और इससे सिस्टम की कल्पना करके विकसित किया गया। क्रमशः भारतीय सेना, भारतीय वायुसेना के लिए को देने के लिए दो स्तर वाले रडार, स्थानीय चेतावनी रडार (लोवर्ड) और कम ऊंचाई की उड़ान में लक्ष्य का पता लगाने वाले रडार (एलएफडीआर) पहले स्वदेशी रडार थे, डीजिटल संकेत प्रक्रमण, डिजिटल डिस्प्ले प्रदर्शन तथा रडार डेटा प्रक्रमण जैसी आधुनिक विधियां का प्रयोग विकास के लिए चुना गया। बाद में उनका दोबारा नाम इंन्दिरा-1 इंन्दिरा-II रखा गया। डीडीपीआईएल प्रक्रिया पर आधारित "आधुनिक परियोजना प्रबधन" संतुलित संगठनात्मक मेल के साथ पक्के रूप से स्थापित किए गये थे।

एलआरडीई के वैज्ञानिक अपने समय में सदैव अग्रेणी रहे हैं। चरण व्यवस्थित डिजाइन हाईवेयर की इंजिनियरी तथा बहु प्रकार के रडार हेतु पीसीएम का विकास अक्ष शास्त्र प्रणाली के लिए शास्त्र निमंत्रण रडार राजेन्द्र का विकास करने का मार्ग प्रशस्त किया। अनिश्चिताएं एवं चुनौतियो से भरे इस युग में पल्स केम्प्रेश्न वाले इंन्दिरा-I इंन्दिरा-I I था एवं राजेन्द्र रडार का प्रसार किया गया।

प्रलोभन या विकास करने वाली परिस्थियों के बढ़ने के सारण स्वर्ण ज्यंती अवधि के दितीय अर्द्ध के दौरान एलआरडीई की अप्रत्याशित विकास हुआ। निस्संदेह इन्दिरा श्रृंखला के रेडारों का डिजाइन विकास एवं पूर्ति इसके बाद राजेन्द्रा चरणबद्ध सुव्यवस्थित रडार, डब्ल्यूएलआर, बीएफएसआर–एसआर, 3डी सीएआर, रोहिणी, रेवती,  3डी-टीसीआर, भराणी, अलेशा एक्सवी-2004 और इस प्रकार के हैं, जो एलआरडीई की परिपक्क्ता का सही दर्पण है, उनका वर्चस्व केवल भूमि विमान वाहित तथा जलपोत वाहित परिसर रडार प्रणालियों में ही नहीं है अपितु सहकारी प्रणाली इंजिनियरी, आरएवंडी- प्रोद्योगिकी एवं परियोजना प्रबधन में भागीदारी एवं व्यवसायिक पहुंच के अभ्यास में भी है। प्रयोक्ता के अटूट विश्वास के आधार पर शत्रु का सामना करने के लिए एलआरडीई को एक शक्ति के बल के रूप में परिवर्तित कर दिया है। इस प्रकार के बहुत से रडार अब प्रयोक्ताओं द्वारा अंगीकरण कर लिए गए या प्रस्तावित किये गये।

चरणबद्ध ऐरेज, मल्टीबीम एंटीना, स्लॉटड वेवगाइड और पैच ऐरेज, अधिक गति वाले कम्यूटिंग प्रोग्रामेबल सिग्नल और डेटा प्रोसेर्स, हाई प्यूरटी आरएफ स्रोत, वाइड बैंड कोहैरेंट मल्टी चैनल रिकीवर, हाईपॉवर कोहैरेंट ट्रांसमीटर्स जैसी उद्धृत वर्तमान प्रविधियां 1970-90 के पिछले दो दशकों में खोजते हैं।

नब्बे में तथा इससे आगे माइक्रोवेव, डिजिटल एवं सॉफ्टवेयर टेकनोलॉजी ने विश्व को बदल डाला। एलआरडीई ने अवसरों को हथिया लिया और पीछे मुड़कर कभी भी देख नही रहा है। 2001 में एलआरडीई के लियें "रडार" एकमात्र केन्द्रित कार्यक्षेत्र बन गया। भारत सरकार की उदारीकरण एवं विश्वयापी नीतियों के प्रकाटीकरण के कारण विश्वभर के रडार में भारी होड़ हुई।

एलआरडीई ने अपने आप को एक परिपक्व भरोसेयोग्य रडार का सिस्टम हाउस, आधुनिक परियोजना प्रबधन पद्धतियों या स्वीकरणों, भागीदारों तथा सहयोगियों के रुप में उद्योगों को बढ़ावा देना और मानव संसाधनों का विकास करने वाले के रुप में निखारा। प्रौद्योगिकी, पुर्जों और औद्योगिक संबंध के लिये अधिक ध्यान दिया गया।

परिसर के डिजाइन और विकास के लिये की गई गतिविधियों से उत्कृष्ट भूमि आधारित सक्रिय ऐरेज आधारित इलैक्ट्रॉनिक रूप से स्कैन किया गया टीआर मॉड्यूल और विमान रहित रडार यह समय कि एक बात है जब विश्व डिजिटल ऐरेज रेडारों में एलआरडीई की चमत्कारिक गतिविधियों को निहारेगा।

गुणवत्ता नीति

एलआरडीई प्रभावकारी गुणवत्ता प्रबंधन प्रणाली के माध्यम से आधुनिक रडार प्रणाली के स्वदेशी विकास के लिए प्रतिबद्ध है।

कोर क्षमताएं

  • भूतल आधारित, जहाज रोपित तथा विमान रोपित प्रणालियों की रडार प्रणाली अभियांत्रिकी।
  • वृहत उप-प्रणालियों - मकैनिकल और इलैक्ट्रॉनिक स्कैनिंग एंटिना, उच्च निष्पादन वाले ट्रांसमीटर, एक्साइटर, रिसीवर, टी/आर मॉड्यूल, डिजिटल सिग्नल व डेटा प्रोसेसर, मेकैनिकल अभियांत्रिकी का डिजाइन व विकास करना।
  • रडार प्रणाली का एकीकरण और मूल्यांकन
  • ईएमआई/ईएमसी सहित पर्यावरणीय अभियांत्रिकी।


 
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